यह लेख लिखते समय मैं कुर्सी पर बैठा उछलने की कोशिश कर रहा था कि शायद काम जल्दी हो जाए. मगर यह क्या, काम तो लगभग
रुक ही गया! दरअसल बाबाजी, हर काम का अपना एक नियम होता है. उछलना कूदना और हर काम तेज़ी से करना शरीर के स्वास्थ्य के
लिए बहुत लाभदायक है, मगर, कुछ कामों के लिए ख़तरनाक भी सिद्ध हो सकता है. उछलते हुए पानी पीने की कोशिश कभी मत
कीजिएगा. ठीक इसी तरह, देश और दुनियादारी से जुड़े काम भी शांति से बैठ कर ही किए जा सकते हैं. आपको यह ज़िद थी कि
सामने वाले जेब से सारा पैसा निकल कर आपके सामने मेज़ पर रख दें और फिर अपने हाथ से खुद हथकड़ी भी पहन लें. ऐसा भला
कभी हुआ है? इंसानी फ़ितरत से वाक़िफ़ नहीं हैं आप? खुद को ही देख लीजिए. ज़रा सी उम्मीद जागी कि भविष्य में कभी प्रधान मंत्री
बना जा सकता है और आपने तुरंत प्रधान मंत्री के पद को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की बात उठा दी! स्वयं हित सर्वोपरि, यही
उसूल है ज़िंदगी का.
बिल्ली को बंद कमरे में घेर कर मारने लग जाइए. कुछ देर में देखने को मिलेगा कि उसी डरपोक बिल्ली ने शेरनी का रूप धारण कर
लिया है और आप पर हावी हो रही है. कुछ रास्ता तो उसे निकलने का देना ही पड़ेगा आपको. इसी तरह उन 'ऊँचे' लोगों को घेरने
की ग़लती की है आपने, जो आपके सामने डरपोक नज़र आ रहे थे. अरे यार, जो आगे से भ्रष्टाचार रुक जाए ऐसा क़ानून बनने के रास्ते
में टेढ़ी खीर की तरह अड़े हैं, वो क्या आपके कहने पर पिछले चिठे खोल देंगे?! मेरे जैसा 'बच्चा' भी समझ सकता है ये तो.
इंसानों का सीधा सा यह भी उसूल है कि अगर तेरे जीने से मुझे मरना पड़ता है तो तू मर जा! ऐसे में आपको यह लगता है कि आपका
अनशन तुड़वाने 'उधर' से कोई आता? वो तो शायद इंतज़ार कर रहे हों कि कब 'खबर' आए! गाँधीजी वाले अनशन और बच्चों वाली
ज़िद में फ़र्क़ होता है. यह क्या पकड़ कर बैठे थे आप?
काला धन अगर कभी वापिस आया भी तो लिख कर देता हूँ कि कम से कम 13 साल लगेंगे. अगले दो चुनाव इसी मुद्दे पर लड़े जाएँगे. अबसे
तीसरी सरकार जब तक कार्य काल पूरा करेगी, तब तक कुछ हुआ तो हुआ. आपको रातों रात चाहिए? भूल जाइए.
जब तक इस चीज़ का इंतज़ार करना पड़ेगा, तब तक क्या यह फ़र्ज़ नहीं बनता कि जो धन शायद अब भी बाहर जा रहा हो, उसे
रोका जाए, जो भविष्य में जाने वाला है, उसपर लगाम लगाई जाए, एक अच्छा सा लोकपाल लाया जाए. 2014 में आने वाला प्रधानमंत्र
शायद पूरे देश को ही बेच कर खा जाए, तो क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे से बाहर क्यों. अभी कुछ
जज पकड़े गये जो करोड़ों दबा कर बैठे थे, क्या उनपर लोकपाल की लगाम नहीं लगनी चाहिए ताकि वो कहीं उसी 2014 वाले प्रधानमंत्री
को बा-इज़्ज़त बरी ना कर दें.
"जिसका काम उसी को साजे". अन्ना हज़ारे के पीछे चलने में दिक्कत क्या थी आपको? अन्ना पैसे में आपसे बड़े आदमी ना सही, उम्र, तजुर्बे
और (कुछ चीज़ों का नाम लूँगा तो आपको बुरा लगेगा), आदि-आदि में तो आपसे बड़े हैं ही! आज उनका आंदोलन 'हाईजैक' करने की
कोशिश में आपने ना केवल अपना बंटाधर किया है बल्कि उनके नाम को भी कलंक के कगार तक पहुँचा दिया है सिर्फ़ इसलिए कि आपका
और उनका मक़सद एक है और दुश्मनों को मौका मिल गया है आपकी ग़लतियाँ उनपर थोपने का. आज आपका अनशन टूटते ही आपको
आपकी ग़लतियाँ गिनवाने लग जाऊं तो मेरा 'सनडे' का दिन तो क्या, रात की नींद भी बर्बाद हो जाएगी.
पहली गलतो तो वो जिसपर कि मीडीया तक ने ध्यान नहीं दिया. वो थी अनशन पर बैठने से पहले पुलिस पर्मिशन में 'योग शिविर' बताना.
आप माने या ना माने, मगर सच्चाई यही है कि हम आज भी अँग्रेज़ों के वक़्त वाले 'पुलिस राज' में ही जी रहे हैं, जहाँ हमें पुलिस को
'इनफॉर्म' करने की बजाए उनकी 'पर्मिशन' लेनी पड़ती है अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए भी. उसमें भी उनकी मर्ज़ी है कि 'पर्मिशन'
दें या ना दें. इस केस में आपने ग़लत 'पर्मिशन' ले कर उनके हाथ में हथियार दे दिया जिसे वो जब चाहें अपने आकाओं को खुश करने
के लिए उनके इशारे पर इस्तेमाल कर सकें, और उन्होने किया, खूब किया. जितनी 'एफीशियेन्सी' से कभी आतंकवादियों से भी नहीं
लड़े होंगे, निरीह जनता से लड़े. उनका क्या गया एकाध राजबाला की ज़िंदगी ख़त्म होने से? (वैसे आपका गया कुछ?)
दूसरी ग़लती. राजनीति तो क्या, व्यवहार का 'क ख ग' भी जानने वाला भी कभी वो ना लिख के देता जो आप एक वरिष्ठ नेता रूपी
वक़ील को लिख कर दे आए. बाद में रोना कि धोखा हो गया तो ऐसा ही जैसा कि...... रहने दो उदाहरण, कुछ आपको बुरा लगेगा
कुछ....उनसे तो डर ही लगता है अब.
सबसे बड़ी ग़लती: इसीलिए कह रहा था कि जिसका काम उसी को साजे. अन्ना के आंदोलन के दौरान जब विपक्ष के नेता उनसे मिलने
आए तो उनको बाहर से ही लौटा दिया गया. ऐसा करने वाले अन्ना की समझदारी पर शक़ था आपको? आपको किसी पार्टी विशेष या
किसी बदनाम (जी हाँ, बद ना सही, बदनाम) संगठन को साथ मिलाने की ज़रूरत क्या पड़ गयी थी? क्या हम यह समझें कि
आप अभी से चुनावी समीकरणों में लग गये हैं? आपको पता भी है कि आपकी इस एक नादानी का भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई पर क्या
असर हुआ है और क्या हो सकता है? सीधे शब्दों में कहूँ तो सत्यानाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी आपने. सामने वालों ने इस
पूरी लड़ाई को एक ऐसा रंग देना शुरू कर दिया है कि कुछ धर्म विशेषों के लिए यह पूरी लड़ाई ही 'अछूत' हो जाए. अन्ना के पवित्र
मक़सद को भी बदनाम किया जाने लगा है सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उनका भी मक़सद भ्रष्टाचार से लड़ना है. जहाँ 3 महीने पहले पूर
देश अन्ना के पीछे खड़ा नज़र आ रहा था, वहाँ अब क्या केवल भाजपा के
वोटर ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेंगे? पूरी लड़ाई को सत्यानाश के कगार पर ला दिया आपने और आपको तो खबर भी नहीं होगी!
अन्ना जैसी जिस शख्सियत से दुश्मन भी डरते थे, आज खुलेआम बिना सबूत के उन्हें आर एस एस का एजेंट बता रहे हैं.
उनको ऐसा लगता होगा कि ऐसा करने से मुसलमान भाइयों के तो बल्कि और भी ज़्यादा वोट मिल जाएँगे. अब तो वो और हठी हो कर
बैठ जाएँगे और उतना अच्छा लोकपाल बिल भी नहीं बनने देंगे जितना शायद आपके दखल के बिना बनवा दिया जाता. माफ़ कीजिएगा,
जैसे किसी शरारती बच्चे को कहा जाता है कि तेरी सबसे बड़ी मदद यही है कि तू मदद करने की कोशिश मत कर, आपसे भी आज
यही कहने को जी करता है, "बाबाजी, आप प्लीज़ रहने दीजिए!"
सबसे बड़ी भूल तो मैं बता चुका. अब जो रह जाता है, उसे तो 'भूल' कहने को भी दिल नहीं करता. 'जुर्म' की श्रेणी में आता है
यह तो! सशस्त्र सेना बनाने की बात कर रहे हैं आप? देश पहले ही कई तरह के आतंकवाद और नक्सलवाद से जूंझ रहा है. कौन हैं
वो सब? वही हैं जिन्हें कोई 'मक़सद' दिखा कर बंदूक थमाई गई थी और बाद में वही बंदूक भटक गई. एक और सेना खड़ी करेंगे
आप? माना कि क़ानून के डर से आपने बात बदल ली है, मगर आपका मक़सद अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा है. केवल
शांतिपूर्ण राजनीतिक स्वार्थ वालों को भी अन्ना अपने साथ नहीं मिलाने वाले, आपको कैसे मिलाएँगे? माना लड़ाई आज़ाद की है,
मगर सशस्त्र लड़ाई दूसरे देश के हमलावरों से लड़ी जाती ह, अपने देशवासियों से नही. आज़ादी की पहली लड़ाई में महात्मा गाँधी के
साथ-साथ भगत सिंह और चंद्रशेखर जैसों की भी ज़रूरत थी मगर आज़ादी की ये दूसरी लड़ाई अकेले गाँधीवाद से ही लड़ी भी जा
सकती है और जीती भी जा सकती है. आपसे निवेदन है कि ऐसा कुछ मत कीजिए जिससे इस लड़ाई को कलंक लगे. अत:
आप रहने ही दीजिए, PLEASE!
बाबा रामदेव चाहते क्या हैं? (May 31, 2011)
आयें आप भी यह चार शब्द, 'मैं हूँ अन्ना हज़ारे' या 'I am Anna Hazare' लिख कर भ्रष्टाचार निरोधक ताक़तों का हौंसला बढ़ायें.
या फिर
पढ़ें और देखें कि अब तक किस-किस ने ऐसा लिखा है.
Email अगर आप ना देना चाहें तो ज़रूरी नहीं है. वैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में informed रहने के लिए 90% लोग ना
केवल अपना Email address दे रहे हैं बल्कि इस ब्लॉग को subscribe भी कर रहे हैं. यह लिखने के वक़्त तक english
के लेख के आधार पर 'I am Anna Hazare' के 50 से ज़्यादा कॉमेंट आ चुके हैं. आपका Email address पूरी तरह से सीक्रेट भी रखा
जाएगा और subscribe करने पर भी आपको इस ब्लॉग के अलावा किसी तरह का marketing etc का Email कभी नहीं भेजा
जाएगा.
आइए, अन्ना जी का साथ दीजिए और एक बात गाँठ बाँध लीजिए,"मैं बेईमान हो जाऊं, आप बेईमान हो जाएँ, मगर ये नाम
'अन्ना हज़ारे' कभी बेईमान नहीं हो सकता."Contextual Links