Corruption worldwide is as good as finished now!

With Respect and love to the most honest 'crusader against the corruption' honorable Mr. Anna Hazare from all of the participants who share the burden of this great man & proudly sign the pledge, 'I am Anna Hazare'

Today is Monday, May 21, 2012       Website registered on Wednesday April 6, 2011

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एक सुखद आश्चर्य: अब तक जो हमारी मजबूरी थी वो अब नहीं होगा. कांग्रेस या भाजपा या सपा या बसपा ने जिसको टिकेट दे दिया उनमें से एक को चुनना हमारी मजबूरी है? क्यों?? हमें देश भर से ऐसे अन्ना हज़ारे जैसे 544 चरित्रवान् व्यक्ति चाहिएं जो लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में बैठ कर उसे सचमुच मंदिर सा पवित्र बना सकें. यह काम 2014 के चुनाव में हो कर रहेगा. तय्यारी अभी से शुरू होगी. अपने सुझाव इधर लिखें..www.election.name
A pleasant surprize: It had been our destiny to elect anyone given election ticket by either parties; Congress, BJP, SP, BSP etc. But not anymore....Join us in our search for 544 people having character like Anna Hazare. This will be done before 2014 elections... www.election.name

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चलो माना कि ये भी भ्रष्ट हैं, तो क्या?



इस वजह से हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना छोड़ दें? भूल जाएँ लोकपाल क़ानून को?? खुला हाथ दे दें लूटने के लिए???


पता नहीं राजनेताओं का अंदाज़ा कितने प्रतिशत सही है मगर सच्चाई यही है की वो भारत की आम जनता को शत-प्रतिशत बेवक़ूफ़ समझते हैं. जब से जन सैलाब से हारकर हमारी सरकार को जन लोकपाल विधेयक लाने की बात स्वीकार करनी पड़ी है, तब से ही ना केवल सरकार के, अपितु जिन को दूर-दूर से भी उम्मीद है कि कभी ना कभी कोई ना कोई मलाई उनके हाथ भी लग सकती है, उन सब ने एक तरह से खुद को सुपारी ही दे रखी है जन लोकपाल नाम की चीज़ को पैदा होने से भी पहले ख़त्म करने की. और कुछ नहीं मिला तो जो लोग जन लोकपाल के वक़ील हैं, उनको ही भ्रष्ट साबित करने के लिए दिन रात एक किए जा रहे हैं. कल श्री अमर सिंह जी, जो कभी अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए गला फाड़ते नहीं थकते थे, वो यहाँ तक कह गये की उन्होने 'दलाली' से लेकर 'सप्लाई' तक की है(जैसे ये सब तो शर्म की बात रही ही नहीं आजकल)सिर्फ़ किसी तरह ये यकीन दिलाने के लिए कि वो सच बोल रहे हैं और श्री शांति भूषण और श्री प्रशांत भूषण भ्रष्ट हैं."आदरणीय" अमर सिंह जी, (विरोधियों के लिए "आदरणीय" शब्द का प्रयोग इसी तरह करते हैं ना आप?) जनता यह बात माने या ना माने, मगर आप ही की ज़ुबानी आप ही की करनी को अच्छी तरह नोट कर लिया गया है और अब अगले चुनाव का इंतेज़ार है. पता चल जाएगा जनता कितनी कुछ बेवक़ूफ़ है.

अरे नेताजी लोगों, इतनी तक़लीफ़ क्यों उठाते हो? चलो संपूर्ण भारत की जनता की तरफ से मैं ही एक मिनट के लिए मान लेता हूँ (क्षमा याचना सहित) कि श्री शांति भूषण और श्री प्रशांत भूषण से अधिक भ्रष्ट अपने महान भारतवर्ष में और कोई है ही नहीं .....तो? तो भी क्या?? तो यह मानने के बाद अब हमारे लिए क्या आदेश है? क्या हम छोड़ दें भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई? भूल जाएँ लोकपाल जैसी कोई चीज़? उसकी जगह तय्यार रखें अपने कंप्यूटर को कल आने वाले एक और 'इतने लाख उतने करोड़' के घोटाले के बारे में लिखने... लिखने और सिर्फ़ लिखने के लिए?? या चैनल पर गला फाड़कर सिर्फ़ चीखने के लिए??? भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई सिर्फ़ इसीलिए खटाई में डाल दें क्योंकि हमारे वक़ील बेईमान हैं? (अफ़सोस मैं श्री शांति भूषण जी का वक़ील नहीं हूँ और ना ही ये मंच उनके व्यक्तिगत बारे में है, नहीं तो अभी सारे केस से बाइज़्ज़त बरी करवा लेता ऐसे बाइज़्ज़त शख्सियत श्री शांति भूषण जी को जो हम सब के हित में अन्ना जी के साथ मिल कर लड़ रहे हैं.) ये लड़ाई शख्सियतों से कहीं ऊपर है.

दोस्तों 100 में से 99 बेईमान हैं...मेरा भारत बहुत महान है. ऐसे ही नहीं 99corrupt.com जैसी वेबसाइटें बनाई जातीं! बहुत चलेंगीं यहाँ. जी हाँ, 100 में से 99 बेईमान हैं. जो इंसान ये लेख लिख रहा है, क्या वो खुद ये दावा कर सकता है कि वो बाकी 1% में से है? क्या गारंटी है कि अगर उस 'खर्चा सोच-सोच कर' जीने वाले आम आदमी के सामने इतने-उतने करोड़ का सूटकेस रख दिया जाए तो वो 100 प्रतीशत अपने ईमान पर क़ायम रह पाएगा? आप गारंटी ले सकते हैं उसकी? अगर वो सूटकेस उठा लेगा तो इसका मतलब ये नहीं है की वो एक बेईमान की औलाद है, बल्कि इसलिए कि पिछले 2-3 साल से वो लगातार देख रहा है कि इस भ्रष्टाचार की वजह से हालात ऐसे बन गये हैं कि जहाँ 2 साल पहले जिस चीज़ के लिए जेब से 100 रुपये निकालने पड़ते थे, आज 200-250 निकल रहे हैं. जिसके पास हराम की कमाई ना हो, क्या दिल नहीं जलेगा उसका? उसका छोड़िए, अपने दिल पर हाथ रख कर कहिए, खुले आम कहने से डर लगता है तो दिल में ही सोचिए कि ऐसे में आप कितने कायम रह सकते हैं ईमान पर? हम सब इंसान 'आम इंसान' हैं और कभी भी कमज़ोर पड़ सकते हैं. भगवान नहीं हैं हम. क़ानून इसीलिए बनाए जाते हैं कि लालची इंसानी फ़ितरत पर लगाम लगाई जा सके. आम आदमी के लिए बहुत से क़ानून है मगर क्या क़ानून बनाने वालों के लिए कोई क़ानून है? क़ानून हो भी तो पालन करवाने वाला कोई है? दशकों से थोड़ा-थोड़ा हर तरह का भ्रष्टाचार चल रहा था. मगर हद तो तब हो गई जब सभी हदें पार हो गईं. इतने हज़ार-करोड़, उतने लाख करोड़...और इस तरह सारे के सारे करेन्सी नोट चले गये छुट्टियाँ मनाने स्विट्ज़र्लॅंड! यहाँ लोगों के पास खाने को नहीं, जुर्म बढ़ता जा रहा है, भुगतता कौन है? भुगतता है आम आदमी या आम औरत जिसे सड़क पर निकलना है निहत्थे, ना कि ब्लॅक कैट कमॅंडो से घिरे नेता लोग. इसी मजबूरी ने जन्म दिया ऐसे आंदोलन को जैसा इस देश ने आज़ादी के बाद कभी नहीं देखा था. ऐसे में अगर कोई श्री शांति भूषण जैसा व्यक्ति जो कथित तौर पर खुद भ्रष्ट होने के बावजूद 'आ बैल मुझे मार' वाला जन लोकपाल बिल लाना चाहता है तो क्या आप उसे मना कर देंगे?

अब जबकि आपने दिल पर हाथ रखा ही हुआ है तो एक बात और बताइए. खुदा ना ख़ास्ता आप कुछ चालाक लोगों के खिलाफ किसी केस में फँस जाएँ. आपको वक़ील करना पड़ जाए. तब आप क्या करेंगे? यह देखेंगे कि वक़ील इतना ईमानदार हो कि जिसने ज़िंदगी भर राजा हरीशचंद्र की तरह सिर्फ़ सच बोला हो, किसी अदालत को प्रभावित या manipulate करने की कोशिश कभी ना की हो, वगेरह-वगेरह....या फिर कोई तेज़-तर्रार चालू वक़ील लेना पसंद करेंगे जो दुश्मनों के हर दाँव-पेंच जानता हो और पहली ही तारीख में फ़ैसला आपके हक़ में करवा दे? ज़ाहिर है चालू वाला ही लेंगे आप. यहाँ मैं आपको बताऊं कि इस आंदोलन में श्री शांति भूषण हम बेचारे आम लोगों के वक़ील हैं और उन्होने जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट बहुत सख़्त तय्यार किया है; एकदम श्री अन्ना हज़ारे की पसंद का. तभी तो हड़कंप मचा हुआ है राजनीतिक हलकों में! हर भ्रष्टाचारी की जान फटी पड़ी है. इल्ज़ाम पर इल्ज़ाम लगा रहे हैं. अरे भाई ऐसे इल्ज़ाम तो एक वक़ील की तारीफ जैसे हैं. एक वक़ील के लिए 'चालू' होना कोई गाली नहीं है, बल्कि एक तारीफ है, एक गुण है, एक 'compliment' है. सच कहता हूँ अगर मैं वक़ील होता तो खुद को 'हरामी' कहलवाना भी पसंद करता. यह मेरे profession के लिए बहुत अच्छा रहता.

कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से ईमानदार या पूर्ण रूप से बेईमान कभी नहीं होता. अगर आप भी किसी वजह से बेईमानी के रास्ते पर थोड़े से बढ़ चुके हैं, मगर यह सोचते हैं कि पहले बाकी सब ईमानदार हो जायें तो मैं भी खुशी से ईमानदार हो जाऊँगा, तो अभी वक़्त है इस सपने को साकार करने का. अब नहीं तो कभी नहीं. अपने अंदर के 'अन्ना हज़ारे' को जगाइए; भले ही खुद की बजाए पहले दूसरों को ईमानदार बनाने के लिए कमर कसिये, इस मन्नत के साथ कि पहला पत्थर ना सही मगर एक पत्थर तो मैं भी उठा रहा हूँ इस नीयत के साथ कि आने वाले कल में मैं भी बिना भ्रष्टाचार किए जीवन जी सकूँ. यकीन मानिए, अपने देश में इतना कुछ है कि अगर बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाए तो छोटे स्तर पर किसी को भ्रष्टाचार करने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. एक आम आदमी की ज़िंदगी भी यहाँ किसी यूरोपियन या अमेरिकन से कम नहीं हो सकती. मगर बड़े स्तर के भ्रष्टाचार ने इसे इस हालत तक पहुँचा दिया है कि छोटे स्तर पर कोई भी बिना "भ्रष्ट" "आचार" किए जीवन जी ही नहीं सकता. यूँ समझ लीजिए कि बड़े पापी आपको भी ज़बरदस्ती मजबूर करके पाप के रास्ते पर धकेल रहे हैं. और खुदा ना ख़ास्ता अगर आप ईमानदार रहने का प्रण लिए हुए कोई सरकारी अफ़सर या ठेकेदार या ठेकेदार के एंप्लायी हैं तो फिर तो शायद आपकी जान पर भी सीधे तौर पर बन सकती है. क्योंकि सवाल आज करोड़ों का नही, लाखों-करोड़ का होता है, और इंसान की जान की कीमत ही क्या है, सिर्फ़ कुछ लाख की 'सुपारी'?! क्या ऐसे हालात चलने दिए जा सकते हैं?

आज ही एक खबर सुनी है: वो लोग कहते हैं कि कर्नाटक में लोकायुक्त होने के बावजूद भ्रष्टाचार है.(इसलिए लोकपाल बिल बेकार है और इसके लिए लड़ना छोड़ दो और हमें खाने दो जितना हम खाना चाहते हैं) अगर वही लोकायुक्त खुद ड्राफ्टिंग कमेटी में होंगे तो ध्यान रखेंगे ही कि क्या-क्या कमियाँ हैं और क्या-क्या त्रुटियाँ, क्या-क्या विकलांगताएँ handicaps हैं सरकारी लोकपाल बिल में. इसलिए जस्टिस संतोष हेगड़े को हटवाना भी शायद ज़रूरी हो गया है बिल के विरोधियों के लिए.

अगर अभी तक जनता में कोई भोला-भला है तो उसे मैं यह बताना चाहता हूँ कि यही, बस यही फ़र्क़ है 'सरकारी लोकपाल' में और 'जन-लोकपाल' में! सरकार अपना 'सरकारी लोकपाल' बिल 43 साल पहले संसद में लाई थी और बिना 'अन्ना हज़ारे एंड कंपनी' की मदद के अगले 43 साल में शायद उसे पास भी करवा लेगी और शायद 2054 तक आपको लोकपाल मिल भी जाएगा, मगर फिर नतीजा कर्नाटक जैसा ही होगा. उदाहरण के तौर पर किसी मुजरिम से कहा जाए कि चल, अपनी अदालत खुद लगा और जज को भी खुद नौकरी पर रख, तो आपको क्या लगता है, वो जज उसी अदालत में उसी 'माई-बाप' मुजरिम को सज़ा देगा? दे पाएगा?? सरकारी लोकपाल बिल के हिसाब से लोकपाल की नियुक्ति सरकार ही करेगी और उस लोकपाल के पास केस दर्ज़ करने तक की भी पावर नहीं होगी. ऐसे में उसका होना या ना होना एक बराबर है. यहीं टकराव है सरकार और श्री अन्ना हज़ारे में. श्री अन्ना हज़ारे और श्री शांति भूषण वगेरह की समिति ने जो जान लोकपाल का ड्राफ्ट तय्यार किया है उसमें लोकपाल के दफ़्तर को सरकार के नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त रखने की सिफारिश है, ताकि सरकार में बैठा कोई अगर देश को लूटे तो उसे भी सज़ा दिलवाई जा सके. यह बहुत ज़रूरी है और इसके बिना लोकपाल का कोई मतलब ही नहीं, क्योंकि देश को लूटने की ताक़त सरकार में बैठे किसी भ्रष्ट नेता से ज़्यादा तो किसी में हो ही नहीं सकती और उसी के लोग तो 'इतने लाख उतने करोड़' रुपयों को 'छुट्टी देकर' स्विट्ज़र्लॅंड भेजते पाए जाते हैं!

हमारा मतलब सिर्फ़ भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने से है, कितना भ्रष्ट व्यक्ति ये क़ानून बनवाता है ये 'immaterial' है. वो बुज़ुर्ग जिनका नाम अन्ना हज़ारे है, जब वो ईमानदार हैं तो उनके मददगार हमारे-आपके जैसे चाहे जितने भी भ्रष्ट हों, क्या फ़र्क़ पड़ता है?! क्या फ़र्क़ पड़ता है जब तक क़ानून 'अन्ना' के मन का ही बनता है? और सब नाम छोड़िए, सिर्फ़ अन्ना हज़ारे का नाम याद रखिए. यह एक नाम है जो कभी भ्रष्ट नहीं हो सकता. केवल इसलिए नहीं कि अन्ना हज़ारे नाम के व्यक्ति भ्रष्ट नहीं हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि 'अन्ना हज़ारे' अब केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं है. ये एक क्रांति का नाम है. आज बच्चा-बच्चा जिसको भी ये कहने का मौका मिले, वो यह कहने से नहीं चूकता कि मैं हूँ अन्ना हज़ारे! I am Anna Hazare!!

यह जो आंदोलन इतना कामयाब हुआ है, इसका श्रेय मीडीया को भी बहुत जाता है. मगर क्या मीडीया पूरी तरह 'भ्रष्ट' 'आचार' से मुक्त है? क्या पैसे, TRP या अन्य किसी वजह से मीडीया वाले लोग उन लोगों के हाथ में नहीं खेल जाते और जाने-अंजाने उनका साथ नहीं दे देते जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस लड़ाई को कमज़ोर करने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं? अभी कल को कोई ऐसा चैनल शायद अपने 'बाप की अदालत' लगाएगा और ऐसे ही किसी नेता को बड़े प्यार से बिठा कर उनपर 'प्यारे-प्यारे से' इल्ज़ाम लगाएगा, उनके उत्तर सुनके, उनको हज़म करके, महिमा-मंडित करके उनको बा-इज़्ज़त बरी भी कर देगा, सच्चा साबित भी कर देगा, माहौल ही कुछ ऐसा प्यारा-प्यारा सा बना देगा कि लोगों को नेताजी से प्यार भी हो जाए और अपने जीवन साथी पर कभी जितना ना हुआ हो, नेताजी की बात पर उतना ऐतबार भी हो जाए! यह सब पैसा ले कर किया जाएगा या बिना पैसे के सिर्फ़ TRP के लिए, ये तो शायद राज़ ही रहेगा. स्टूडियो में बैठे दर्शकों को उनके 'पप्पू-पापा' जैसे सढ़े हुए 'जोक्स' पर हँसने को मजबूर भी कर देगा ताकि अपने-अपने घर बैठे ग़रीब दर्शक भी अपनी हालत पर हंस सकें, चैनल कमाता रहे और भ्रष्टाचार वाली लड़ाई गयी भाड़ में!

यह लड़ाई सिर्फ़ आपकी है; एक आम इंसान की. मीडीया की भी नहीं. मीडीया में तो यह भी एक मत हो सकता है कि अगर भ्रष्टाचार पूरी तरह ही ख़त्म हो गया तो चैनल और अख़बार जियेंगे किस दम पर? धंधा पूरी तरह ख़त्म नहीं तो 90% तो उड़ ही जाएगा. बड़ा खुलासा जब तक स्क्रीन पर नहीं चमकेगा, 3-3 ब्रेक और 30 मिनट में 17 मिनट की ads दिखा कैसे पाएँगे? दूसरी तरफ बड़े-बड़े कार्पोरेट घराने अपना सबकुछ झोंक देंगे इस लड़ाई को कमज़ोर करने में. ऐसे में अगर आप टूट गये तो सबकुछ शुरू होने से पहले ही ख़त्म समझिए. इस लड़ाई में आप अकेले हैं, फिर भी आपको लड़ना है.

ऐसे में हमारी-आपकी एक और ज़िम्मेदारी बनती है. यह ज़िम्मेदारी दिखने में और निभाने में तो बहुत छोटी और आसान है, मगर इसका असर बहुत गहरा है. आपका घरेलू नौकर, आपकी आया, काम वाली बाई, आपके दफ़्तर का चपरासी, आपका ड्राइवर, आपका धोबी..वगेरह...इन सबकी पहुँच आज खबरों तक है. इसी तो नज़र में रखते हुए नेताओं के ऐसे बयान आते हैं जो मिनटों में इन भोले ग़रीबों को गुमराह कर जाते हैं. उनकी पहुँच खबरों तक तो है, मगर बदक़िस्मती से उन खबरों का विश्लेषण करने वाली गहरी सोच तक उनकी पहुँच नहीं. कोई हैरानी की बात नहीं की इनमें से कोई एक जाते जाते सुना जाए कि साहब, सब के सब बेईमान हैं, हमें किसी का साथ नहीं देना चाहिए. ऐसे में समझ लीजिए कि सिर्फ़ एक सोचा-समझा बयान देकर उन नेताओं की जीत हो गयी और अन्ना जी की सारी भूख प्यास जो भी उन्होने सही, बेकार होने की कगार पर है. ऐसे में आप क्या करेंगे? या तो ये सोच सोच कर चुप हो जाएँगे कि इसके मुँह क्या लगना है. या फिर उसे ये समझाने लग जाएँगे कि अन्ना जी के साथी निर्दोष हैं. इस पर शायद ही उनको यक़ीन आए. टेडी खीर साबित होगी. मैं भी ये सब लिखने के चक्कर मे तभी नही पड़ा. आप भी उनको यही समझायें कि उन साथियों से हमारा कोई लेना देना नहीं है और हमें सिर्फ़ बिल से मतलब होना चाहिए. जहाँ तक मुँह लगने की बात है, इस लड़ाई में एक सिद्धांत तो आपको निभाना ही पड़ेगा, 'each one teach one' का सिद्धांत. किसी एक को तो चार शब्दों में आपको समझना ही पड़ेगा. काम के बारे में भी तो समझाते ही हैं. मुश्किल लगे तो इसी लेख का प्रिंट निकाल कर थमा दें. (यह हिस्सा काटकर) हिन्दी में लिखा ही इसलिए है. हिन्दी तो उनके समझ में आएगी ही. मज़े की बात यह है कि ऐसा भी नहीं है आपका सिखाया एक व्यक्ति एक ही रहेगा. इन लोगों की महफिलें बहुत जमती हैं. जो हम और आप जैसा सारा दिन बैठकर twitter और facebook पर नहीं कर पाएगा वो यह एक कर देगा. जिसे भी उसको आपकी यह गहराई वाली बात समझ में आ गयी, वो 36 और को समझा कर खूब तारीफें बटोर लेगा. बात को फैलने में देर नहीं लगेगी कि भारत की जनता को किसी व्यक्ति विशेष से अब कोई मतलब नहीं है. सिर्फ़ बिल की बात कीजिए, और अब तो यही देखना है कि बिल की खिलाफत कौन-कौन करता है. 1947 से पहले ना तो internet था, ना TV, ना रेडियो. आज़ादी की लहर इसी तरह तो फैली थी. आज़ादी की पहली लड़ाई इस तरह लड़ी गयी थी, आज़ादी की दूसरी लड़ाई भी इस तरह लड़ी जा सकती है और पहले से कहीं ज़्यादा आसानी से जीती जा सकती है.

आयें आप भी यह चार शब्द, 'मैं हूँ अन्ना हज़ारे' या 'I am Anna Hazare' लिख कर भ्रष्टाचार निरोधक ताक़तों का हौंसला बढ़ायें. या फिर पढ़ें और देखें कि अब तक किस-किस ने ऐसा लिखा है. Email अगर आप ना देना चाहें तो ज़रूरी नहीं है. वैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में informed रहने के लिए 90% लोग ना केवल अपना Email address दे रहे हैं बल्कि इस ब्लॉग को subscribe भी कर रहे हैं. यह लिखने के वक़्त तक english के लेख के आधार पर 'I am Anna Hazare' के 50 से ज़्यादा कॉमेंट आ चुके हैं. आपका Email address पूरी तरह से सीक्रेट भी रखा जाएगा और subscribe करने पर भी आपको इस ब्लॉग के अलावा किसी तरह का marketing etc का Email कभी नहीं भेजा जाएगा.

आइए, अन्ना जी का साथ दीजिए और एक बात गाँठ बाँध लीजिए,"मैं बेईमान हो जाऊं, आप बेईमान हो जाएँ, मगर ये नाम 'अन्ना हज़ारे' कभी बेईमान नहीं हो सकता."