बाबा रामदेव का मैं फ़ैन था कुछ महीने पहले तक. चाहे वो देश के प्रति चरित्र का मामला हो या औरतों और कन्याओं के प्रति.
हम हिंदुस्तानियों में यह ख़ासियत है कि फटाफट किसी के भी फ़ैन बन जाते हैं और फिर
किसी दिन उसे उस गद्दी से उतार कर फैंक भी उसी आसानी से देते हैं. यही सोच कर मैने उन्हे इस गद्दी से नहीं उतारा जिस दिन वो
पहली बार अन्ना हज़ारे के आंदोलन के खिलाफ बोले थे. उस दिन उनपर या उनकी मंशा पर शक़ करने की कोई माक़ूल वजह नहीं थी.
मगर अब कुछ अजीब सा लग रहा है जब सरकार की और उनकी बोली एक सी लग रही है. क्या वो समझते भी हैं कि लोकपाल का मतलब
क्या है? प्रधान मंत्री को उससे मुक्त कर अलग कर दो, सब मंत्रियों को उससे मुक्त कर अलग कर दो, न्याय-पालिका को उससे मुक्त कर
अलग कर दो, सरकारी से लेकर बाबुओं को उससे मुक्त कर अलग कर दो, तो बचेगा क्या? (अभी मैं आम बोलचाल की भाषा में 'घंटा'
लिखने लगा था.)
यही सब लोग तो हैं जिन्होने अतीत में इस देश को लूट-लूट कर खोखला किया है, और अगर इनको ही इससे मुक्त कर दिया तो इसके
दायरे में रहेगा कौन, अन्ना हज़ारे और उनकी टीम? सावधान, ये सब चाल है सौदेबाज़ी में डालने की. पहले सबको बाहर का रास्ता दिखा
कर अंत में सिर्फ़ प्रधानमंत्री के नाम पर फ़ैसला कर लिया जाएगा. तब तक अन्ना की टीम भी लड़ते-लड़ते थक चुकी होगी. देशवासियों का
दम भी टूट चुका होगा. मैं पूछता हूँ कि किस संविधान के तहत प्रधान मंत्री किसी आम नागरिक से अलग है? दूसरी बात यह है कि
भविष्य का कोई प्रधानमंत्री आदरणीय डॉक्टर मनमोहन सिंह जी जैसा नहीं आने वाला. प्रधान मंत्री के पद को किसी क़ानून के दायरे से
बाहर रखने का मतलब है भ्रष्टाचार का सबसे ऊँचा दरवाज़ा खुला छोड़ देना!
बाबा जी का कहना है कि अगर चीफ जस्टिस भ्रष्ट हो सकता है, प्रधान मंत्री भ्रष्ट हो सकता, तो लोकपाल क्यों नहीं. वो भी तो हो सकता है.
मेरा इस बारे में यह कहना है कि फिर तो प्रधान मंत्री और मुख्य न्यायाधीश ही क्यों, सबको ही बाहर रखो लोकपाल के दायरे से. बनाओ
ही नहीं लोकपाल. प्रधान मंत्री या किसी अन्या को दायरे में रखने या ना रखने की तो बात ही नहीं है, बाबा ने तो लोकपाल और लोकपाल
आंदोलन पर ही सवाल उठा दिए हैं यह कहकर कि वो भी भ्रष्ट हो सकता है और इसका मतलब उसे भूल जाइए. बाबाजी को सुनने वाले
लाखों लोग हैं, जिनमें से अधिकतर उनके शब्द को ही अंतिम मानते हैं, ऐसे में क्या असर पड़ेगा अन्ना के जान लोकपाल आंदोलन पर?
मुझ जैसा कहाँ कहाँ जाकर लोगों तो यह बात समझाता रहेगा जो मैं यहाँ लिख रहा हूँ. सत्ता ज़िम्मेदारी लाती है और बाबा के पास इस वक़्त काफ़ी
सत्ता है. दूसरों का रास्ता काटने की बजाए उन्हें अपने रास्ते पर ध्यान देना चाहिए. बाबा का अजेंडा है विदेशों में जमा काला धन वापिस
लाने का. मगर आगे कुछ ना जाए ऐसा प्रावधान होने के रास्ते में क्यों मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं? हमारे भोले-भाले अन्ना हज़ारे तो उनको
समर्थन दे रहें हैं और देना भी चाहिए, अन्यथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई कमज़ोर हो जाएगी. मगर बाबा अन्ना को दिल से समर्थन क्यों नहीं दे पा रहे अगर उनकी मंशा उतनी ही पवित्र है तो?
83 हज़ार की निजी संपत्ति के साथ हमेशा निर्मल मुस्कान मुस्कुराने वाले अन्ना जिनमें स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री की छवि दिखाई देती
है, कोई कम संत या बाबा नहीं हैं हालाँकि भगवा नहीं पहनते और चार्टर्ड प्लेन की इच्छा नहीं रखते.
या तो बाबाजी ने जन लोकपाल
ड्राफ्ट पढ़ा ही नहीं है, या फिर मेरा यह सोचना सही है कि वो इस मामले में भ्रम
फैला रहे हैं क्योंकि यह उनका अपना मुद्दा नहीं है और कोई और इसका श्रेय लेगा. लोकपाल के जो प्रावधान हैं उनके अनुसार लोकपाल अपनी
मर्ज़ी का मालिक नहीं होने वाला. और ना ही वो नेताओं द्वारा चुना जाने वाला है. उसके खिलाफ एक शिकायत का मतलब है 2 महीने के
अंदर अंदर उसकी जाँच और छुट्टी!और इस सबसे उपर अन्ना हज़ारे, किरण बेदी वगेरह जैसे कई ईमानदार लोग लोकपाल के जन्मदाता भी
तो बैठे हैं उसपर नकेल रखने के लिए. इस पद पर बिठाया ही ऐसा व्यक्ति जाएगा जिसकी छवि श्री अटल बिहारी वाजपयी या डॉक्टर
मनमोहन सिंह जी जैसी हो. (कमज़ोरी के मामले में नहीं). कहने का मतलब है साफ-सुथरी और बेदाग छवि. उसका सारा कामकाज पारदर्शी
रखा जाएगा और आपके मेरे जैसा आम आदमी सबकुछ देख-पढ़ पाएगा. वैसे ही जैसे आप मेरा लिखा ये पढ़ रहे हैं. पढ़िए लोकपाल ड्राफ्ट के
सार का बिंदु नंबर 7 और 8.
7. But won't the government
appoint corrupt and weak people as Lokpal members: That won't
be possible because its members will be selected by judges, citizens and constitutional
authorities and not by politicians, through a completely transparent and participatory
process.
8. What if some officer in Lokpal becomes corrupt: The entire functioning of Lokpal/
Lokayukta will be completely transparent. Any complaint against any officer of Lokpal
shall be investigated and the officer dismissed within two months.
मैं जब पर यह खबर TV देख रहा था कि प्रधान मंत्री ने कहा है कि इस मामले में उनकी व्यक्तिगत राए कोई मायने नहीं रखती, उस वक़्त
मेरे हाथ में remote control था और गुस्से के मारे मैने फटाफट चैनल बदल दिया. TV को वही चैनल दिखाना पड़ा. रिमोट कंट्रोल के
आगे TV की राए कोई मायने नहीं रखती. उसे वही करना पड़ेगा जो रिमोट ने बोला.
अँग्रेज़ों के ज़माने में कभी भी अँग्रेज़ खुद किसी राजा की गद्दी पर नहीं बैठे थे. हमेशा अपने ही किसी वफ़ादार हिन्दुस्तानी को बिठाते थे और
इस बहाने खुद राज करते थे. वक़्त आज भी बदला थोड़े ही है. वहीं आ कर ठहर गया है.
खैर हम बाबा रामदेव की बात कर रहे थे. यह तो जग ज़ाहिर है कि बाबा राजनीति में आ ही गये समझिए. अब ऐसे में प्रधानमंत्री की
गद्दी उनसे दूर नहीं दिखाई देती. अब अगर वो ऐसे में वो खुद प्रधान मंत्री की कुर्सी को किसी क़ानून से सुरक्षित रखना चाहते हैं तो इससे हम
बेचारे आम लोग क्या मतलब निकालें? बाबाजी चाहते क्या हैं?
बाबाजी आप रहने ही दीजिए, please!
(June 12, 2011)
आयें आप भी यह चार शब्द, 'मैं हूँ अन्ना हज़ारे' या 'I am Anna Hazare' लिख कर भ्रष्टाचार निरोधक ताक़तों का हौंसला बढ़ायें.
या फिर
पढ़ें और देखें कि अब तक किस-किस ने ऐसा लिखा है.
Email अगर आप ना देना चाहें तो ज़रूरी नहीं है. वैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में informed रहने के लिए 90% लोग ना
केवल अपना Email address दे रहे हैं बल्कि इस ब्लॉग को subscribe भी कर रहे हैं. यह लिखने के वक़्त तक english
के लेख के आधार पर 'I am Anna Hazare' के 50 से ज़्यादा कॉमेंट आ चुके हैं. आपका Email address पूरी तरह से सीक्रेट भी रखा
जाएगा और subscribe करने पर भी आपको इस ब्लॉग के अलावा किसी तरह का marketing etc का Email कभी नहीं भेजा
जाएगा.
आइए, अन्ना जी का साथ दीजिए और एक बात गाँठ बाँध लीजिए,"मैं बेईमान हो जाऊं, आप बेईमान हो जाएँ, मगर ये नाम
'अन्ना हज़ारे' कभी बेईमान नहीं हो सकता."